इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गंगा एक्सप्रेस वे परियोजना पर रोक लगा दी है, गंगा महासभा और विंध्य इंवायरमेंटल सोसाइटी की तरफ से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायामूर्ति अशोक भूषण और अरुण टंडन ने यह आदेश पारित किया।
न्यायालय ने अपने आदेश में इस मायावती सरकार की सबसे महत्वकांक्षी परियोजना के निर्माण के लिए स्टेट लेवल इनवायरमेंट इम्पैक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी की मंजूरी की रिपोर्ट को खारिज कर दिया। राज्य सरकार द्वारा गठित इस कमेटी ने गत जुलाई 2007 को परियोजना को अपनी मंजूरी दी थी। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि एक्सप्रेस वे के निर्माण में राज्य सरकार फिर से इस कमेटी की स्वीकृति ले।
याचिकाकर्ता राहुल मिश्रा ने कहा कि नोएडा से बलिया को जोड़ने वाली गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना के निर्माण में प्रदेश सरकार ने पर्यावरण के नियमों की अनदेखी की। याचिका में परियोजना के निर्माण के लिए स्टेट लेबल इनवायरमेंट इम्पैक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी की तरफ से दी गई स्वीकृति पर भी सवाल उठाए गए।
राज्य सरकार ने स्टेट लेवल इनवायरमेंट इम्पैक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी का गठन केंद्र सरकार द्वारा 14 जुलाई 2006 को जारी अधिसूचना के निर्देशों के आधार पर किया था।
Saturday, May 30, 2009
मायावती को झटके पे झटका !!
Posted by सचिन चौहान at 5:35:00 AM 1 comments
Friday, May 29, 2009
मीडिया पर मीडियाविद का आरोप, मीडिया चारित्रिकपतन की और !
'लोकसभा चुनाव में मीडिया की भूमिका' विषय पर यहाँ माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नोयडा परिसर द्वारा ने एक गोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसमें मीडिया विद ने ये विचार दिए।
जहाँ अनेक मीडिया विद का मानना था की मीडिया को स्वयं अपनी भूमिका पर समीक्षा कर अपने ऊपर अंकुश लगाना चाहिए। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जीएन रे ने मीडिया की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा की मीडिया पर निगरानी के लिए एक प्रणाली की जरूरत है।
हम भूले नही हैं जब कुछ दिनों पूर्व ही मुंबई आतंकी हमले के बाद जब सरकार ने मीडिया पर नकेल कसने की तैयारी की थी तो सारे मिडिया वाले सियार की तरह हुआं हुआं करते हुए एक स्वर में मीडिया की आजादी हनन की आवाज उठाई थी मगर समय ने साबित किया की भारतीय मीडिया सियार की शकल अख्तियार करता जा रहा है। आमजनों की भावना को बाजार में बेचा जा रहा है।
संगोष्ठी में अंग्रेजी दैनिक 'द पायनियर' के संपादक और सांसद चंदन मित्रा ने कहा कि इस बार के चुनाव में मीडिया की नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही भूमिका रही है। मीडिया ने जहाँ लोगों को वोट देने के लिए जागरूक करके सकारात्मक भूमिका निभाई वहीं कथित तौर पर पैसे लेकर खबरें छापकर या दिखाकर उसने भ्रष्टाचार की नई इबारत गढ़ दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पूरे चुनाव को मनोरंजन के रूप में लिया और ब्रेकिंग न्यूज दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ाई। इससे खबरों की विश्वसनीयता नीचे गिर गई। मित्रा ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बड़े चैनल विज्ञापन के नाम पर संगठित हो जाते हैं और वे पार्टियों से कहते हैं कि एक दर विशेष के नीचे हम विज्ञापन स्वीकार नहीं करेंगे।
प्रभाष जोशी ने मीडिया में आ रही इस विकृति की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसके समाधान के लिए सुझाव दिया कि देशभर के पत्रकारों को एकजुट कर निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों को पैसे लेकर छापी जाने वाली खबरों को विज्ञापन का रूप देना चाहिए तथा इसकी जानकारी पाठकों को देनी चाहिए तथा सबसे महत्वपूर्ण बात कि पाठकों को आदर्श पत्रकारिता के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए।
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जीएन रे का लिखा हुआ भाषण वितरित किया गया जिसमें कहा गया कि पत्रकारिता के मूल्यों और मीडिया पर विश्वास को बनाए रखने रहने के लिए पत्रकारों को आत्ममंथन करना होगा। उनके लिए एक विनियामक बोर्ड की भी आवश्यकता है।
विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने आरोप लगाया कि इस बार के आम चुनाव में राजनीति और मीडिया ने मिलकर लोगों के साथ फरेब किया। समारोह में प्रख्यात समाजवादी चिंतक सुरेंद्र मोहन ने सवाल उठाया कि क्या भारत में मीडिया कभी निष्पक्ष रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि मीडिया को निष्पक्ष बनाने के लिए एडिटर्स गिल्ड और भारतीय प्रेस परिषद जैसी संस्थाओं को मजबूत बनाना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर त्रिखा ने कहा कि पत्रकार गहरे संकट में हैं जिसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं। स्तंभकार अवधेश कुमार ने कहा कि कथित तौर पर पैसे लेकर जगह बेचने की समस्या में केवल मीडिया का दोष नहीं है, यह लोकंतत्र का दोष है। लोकतंत्र, पूँजीवाद और मीडिया एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। पूर्व मंत्री सोमपाल शास्त्री ने कहा कि समाचार पत्रों का ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसार बढ़ा लेकिन सामाजिक समस्याएँ समाचार पत्रों में अब कोई मुद्दा नहीं हैं। विश्वविद्यालय के नोयडा परिसर के निदेशक प्रो। अशोक टंडन ने कहा कि मीडिया ने कई आपत्तिजनक भाषणों के अंशों को दिखाया जो कि मानहानि के अंतर्गत आता है।
मीडिया की इस संदेसाह्पद भूमिका के लिए नि:संदेह मीडिया ही जिम्मेदार है। सरकार बन्ने के बाद जिस तरह संभावित पाँच साल के सरकारी विज्ञापन के लिए मीडिया महिमा मंडन में लगा हुआ है चिंतनीय है।
Posted by सचिन चौहान at 11:27:00 PM 0 comments
दस पैसे में लोकल पच्चीस पैसे में एस टी डी : ए राजा !
Posted by सचिन चौहान at 6:09:00 AM 9 comments
Thursday, May 28, 2009
आंकडा,बहुमत,जोड़-तोड़, सरकार और लोकतंत्र !
नयी सरकार बन चुकी है और एक बार फ़िर से सिंह इज किंग। सरकार बनने के लिए २७२ का आंकडा भले ही यु पी ऐ ने पूरा न किया हो मगर जब बात आंकडों का हो तो सब सही है आख़िर जोड़ तोड़ और राजनीति की बिसात पर अपना अपना हित जो है।
२६२ के साथ युपीऐ सबसे बड़ी मगर बहुमत के लिए दस कम तो मामला फ़िर आंकडे से। सरकार से सहयोग या सरकार से स्वयंहित की सिद्धि की समर्थनों का तांता, मामला यहाँ भी आंकडे का। चुनाव पूर्व गठबंधन और चुनाव के बाद समझौता सरकार बनाने के लिए चाहे इसके लिए राष्ट्र से समझौता क्यूँ न करने पड़े पहले चरण के मतदान में ६० फीसदी मतदाता ने अपने मतदान का उपयोग किया यानि की ४० फीसदी लोगों ने अपना मत नही डाला। दुसरे चरण में ये प्रतिशत और गिरा और सिर्फ़ ५५ प्रतिशत लोगों ने मत गिराए इस बार मत ना डालने वालों का आंकडा ४५ प्रतिशत का रहा। तीसरे चरण में आंकडा आधे आधे पर आ गया यानि की ५०-५०। चौथे चरण में कुछ इजाफा हुआ और ५७ प्रतिशत लोगों ने मत डाले यानि की ४३ प्रतिशत ने मत नही डाले। अन्तिम चरण भी उत्साहवर्द्धक नही रहा और ५५ प्रतिशत मतदान हुआ ४५ प्रतिशत शिफर रहे।
अब जरा इस आंकडे को लोकतंत्र के नजरिये से समीक्षा करें तो कुल जमा ५५ प्रतिशत के करीब मतदान हुआ और ४५ प्रतिशत लोगों ने वोट नही डाले। चलिए इस आंकडे को जरा और नजदीक से देखते हैं...
१०० प्रतिशत लोगों में से ५५ प्रतिशत लोग ने मत का उपयोग किया और ४५ प्रतिशत ने नही किया। अब जरा ५५ प्रतिशत को आगे बढायें तो ५५ में से ४० प्रतिशत ला कर आप सरकार बना लें। अब इस आंकडे को आगे बढायें तो ५५ का ४० प्रर्तिशत यानि २२ प्रतिशत।
आप कह रहे होंगे मैं किस नम्बर के खेल में आपको उलझा रहा हूँ तो नि:संदेह ये नंबर का ही तो खेल है अब जरा पुरे भारतवर्ष को एक कर इस आंकडे पर नजर डालें तो २२ फीसदी मत लाकर आप जनता की सरकार बन जाते हैं।
एक नजर चुनाव में हुए मतदान के आंकडों पर.....
Posted by सचिन चौहान at 8:42:00 AM 0 comments